
शिक्षकों का सम्मान, शिक्षा का उत्थान: झारखंड की बदहाल शिक्षा व्यवस्था पर सरयू राय ने उठाए सवाल
जमशेदपुर : झारखंड की शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर गंभीर सवाल उठाते हुए जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि जब शिक्षा की बुनियाद ही कमजोर होगी तो नई शिक्षा नीति का अपेक्षित परिणाम कैसे मिलेगा। उन्होंने राज्य के प्राथमिक विद्यालयों से जुड़े आंकड़े सामने रखते हुए कहा कि सरकार को नई नीतियां बनाने से पहले स्कूलों की आधारभूत जरूरतों और शिक्षकों की समस्याओं पर ध्यान देना होगा।
यह बातें उन्होंने डीबीएमएस हाई स्कूल के कलाकृति प्रेक्षागृह में आयोजित ‘शिक्षकों का सम्मान, शिक्षक का उत्थान’ कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में कहीं। कार्यक्रम में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, तकनीकी संस्थानों के निदेशकों, शिक्षाविदों, शिक्षकों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने झारखंड की शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम का आयोजन स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट और नेचर फाउंडेशन की ओर से किया गया था। कार्यक्रम के अंतिम चरण में विधायक सरयू राय ने उपस्थित सैकड़ों शिक्षकों का सम्मान किया।

21 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर नहीं, 60 प्रतिशत के पास जमीन तक नहीं: सरयू राय
सरयू राय ने झारखंड की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर आंकड़े पेश करते हुए कहा कि राज्य के 21 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में कंप्यूटर की सुविधा नहीं है। 41 प्रतिशत स्कूलों में पुस्तकालय नहीं हैं, जबकि 60 प्रतिशत विद्यालयों के पास अपनी जमीन तक नहीं है।
उन्होंने बताया कि 33 प्रतिशत स्कूलों में बाउंड्रीवाल नहीं है और 75 प्रतिशत विद्यालयों में स्मार्ट बोर्ड की सुविधा उपलब्ध नहीं है। उनके मुताबिक इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य की स्कूली शिक्षा व्यवस्था किस स्तर की चुनौतियों से गुजर रही है।
सरयू राय ने कहा कि कई स्कूलों में शौचालय की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। अनेक विद्यालयों में बेंच-डेस्क की भी कमी है। शिक्षकों की कमी अलग बड़ी समस्या है। जो शिक्षक उपलब्ध हैं, उन्हें भी कई बार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कई शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर जिलाधिकारी कार्यालय अथवा शिक्षा विभाग के अधिकारियों के कार्यालयों में काम करना पड़ता है। इससे शिक्षकों का मूल काम यानी बच्चों को पढ़ाना प्रभावित होता है।
उन्होंने कहा कि “जब हमारी नींव ही कमजोर होगी तो नई शिक्षा नीति क्या करेगी।” इसलिए सबसे पहले शिक्षा की बुनियादी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।

शिक्षा में ज्ञान के साथ कौशल और नवाचार जरूरी: प्रो. अंजिला गुप्ता
कोल्हान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर अंजिला गुप्ता ने कहा कि किसी भी देश का वास्तविक विकास उसकी शिक्षा व्यवस्था से होता है। मौजूदा दौर में केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ कौशल, नवाचार और सामाजिक परिवर्तन की समझ भी विकसित करनी होगी।
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी आक्रांताओं ने सबसे पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया। उनके अनुसार अंग्रेजों के दौर में ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की गई, जिसका उद्देश्य मुख्य रूप से क्लर्क तैयार करना था।
प्रो. गुप्ता ने झारखंड के ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज्य में यह अनुपात बढ़ा है, लेकिन अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है।
उन्होंने शिक्षकों से विद्यार्थियों पर व्यक्तिगत ध्यान देने की अपील की। उनका कहना था कि गुरु और शिष्य के बीच प्रत्यक्ष संवाद और ‘आई-टू-आई’ संपर्क का कोई विकल्प नहीं है। ऑनलाइन शिक्षा उपयोगी हो सकती है, लेकिन शिक्षक और विद्यार्थी के आमने-सामने होने से मिलने वाला शैक्षणिक प्रभाव अलग होता है।
उन्होंने शिक्षकों को बदलती तकनीक के साथ खुद को अपडेट करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को एआई और मशीन लर्निंग जैसी नई तकनीकों को समझना होगा, ताकि वे विद्यार्थियों को बदलते दौर के अनुरूप तैयार कर सकें।

गुरु-शिष्य संवाद में कमी का असर शिक्षा पर पड़ा: प्रो. दिनेश कुमार सिंह
नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार की शुरुआत स्कूलों से करनी होगी। विद्यालयीन व्यवस्था में मौजूद कमियों को दूर करना जरूरी है।
उन्होंने स्वीकार किया कि हाल के वर्षों में गुरु-शिष्य इंट्रैक्शन में कमी आई है, जिसका सीधा प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ा है।
प्रो. सिंह ने कहा कि विद्यार्थी और शिक्षक के बीच संबंध को बेहतर किए बिना शिक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता। समाज की वास्तविक प्रगति के लिए अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अनिवार्य है।
शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की जरूरत: प्रो. गौतम सूत्रधर
एनआईटी जमशेदपुर के निदेशक प्रोफेसर गौतम सूत्रधर ने कहा कि शिक्षक निस्वार्थ भाव से विद्यार्थियों को शिक्षित करते हैं और समाज का दायित्व है कि उनके योगदान का सम्मान किया जाए।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था तेजी से बदल रही है। ऐसे में एडवांस लेबोरेटरी प्रोग्राम शुरू करने की जरूरत है, ताकि विद्यार्थियों को व्यावहारिक और तकनीकी ज्ञान मिल सके।
प्रो. सूत्रधर ने शिक्षा को रोजगार से जोड़ने पर जोर देते हुए कहा कि पढ़ाई तभी अधिक सार्थक होगी, जब विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद उसे अपने रोजगार और करियर में इस्तेमाल कर सकें।
शिक्षकों और मेधावी लोगों का सम्मान जरूरी: प्रभाकर सिंह
सोनादेवी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने कहा कि भारत की शिक्षा और ज्ञान परंपरा बेहद समृद्ध रही है। उन्होंने कहा कि यदि समाज में मेधावी लोगों और शिक्षकों को सम्मान नहीं मिलेगा तो प्रतिभाएं भटक सकती हैं।
उन्होंने शिक्षा को विद्यार्थी-केंद्रित बनाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि शिक्षक और प्रधानाध्यापक के बार-बार तबादले का प्रतिकूल प्रभाव विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है। इसलिए ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए कि शिक्षक और प्रधानाध्यापक का अनावश्यक तबादला न हो।
प्रभाकर सिंह ने शिक्षा नीति में बार-बार बदलाव पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कुछ वर्षों के अंतराल पर शिक्षा नीति बदलने से व्यवस्था में अस्थिरता पैदा होती है।
उन्होंने कहा कि सरकारी और निजी शिक्षा के नाम पर समाज को अनावश्यक रूप से बांटने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। बदलती चुनौतियों का सामना करने के लिए सोच में भी बदलाव जरूरी है।
शिक्षकों को समय पर वेतन मिले: प्रो. चंद्रभूषण शर्मा
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर चंद्रभूषण शर्मा ने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था को शिक्षिकाएं और शिक्षक बड़ी जिम्मेदारी के साथ संभाल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पढ़ी-लिखी शिक्षिकाओं और शिक्षकों को पर्याप्त मानदेय नहीं मिलना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन और सुविधाएं मिलनी चाहिए।
प्रो. शर्मा ने कहा कि कई विद्यालयों में शिक्षकों और आधारभूत संरचना की कमी है। उच्च शिक्षा के लिए कॉलेजों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। इन समस्याओं को सरकार के सामने मजबूती से उठाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि राज्य को ‘डिजर्विंग टीचर्स’ की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने झारखंड से जेआरएफ अभ्यर्थियों की संख्या को लेकर चिंता जताई।
सरकार पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षकों को समय पर वेतन देने के लिए पैसे की कमी बताई जाती है, लेकिन चुनावी योजनाओं के लिए हर महीने धन की व्यवस्था हो जाती है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को समय पर वेतन देना प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों को कमजोर करने के बजाय उन्हें पर्याप्त संसाधन और स्वायत्तता दी जानी चाहिए।

24 जिलों में होगा शिक्षक सम्मान समारोह: अंशुल शरण
युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण ने कहा कि झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में मौजूद कमियों को पहचानने और उनके समाधान की दिशा में प्रयास लगातार जारी रहेगा।
उन्होंने कहा कि शिक्षक सम्मान जैसे कार्यक्रम केवल सम्मान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से शिक्षा व्यवस्था की जमीनी समस्याओं को समझने का अवसर मिलता है।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों से सीधे बातचीत कर व्यवस्था की कमियों को समझा जाएगा और उन समस्याओं को उचित माध्यम से सरकार के समक्ष रखा जाएगा।
अंशुल शरण ने बताया कि ‘शिक्षकों का सम्मान, शिक्षक का उत्थान’ कार्यक्रम केवल जमशेदपुर तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य के सभी 24 जिलों में समय-समय पर शिक्षक सम्मान समारोह आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि अब तक कार्यक्रम में सामने आई चर्चाओं का सार यही है कि झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है।
तीन तकनीकी सत्रों में शिक्षा की चुनौतियों पर हुई विस्तृत चर्चा
कार्यक्रम में तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा और छात्र-युवा असंतोष तक विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।
पहला सत्र: प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा
पहले तकनीकी सत्र में प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। इसमें डॉ. अशोक कुमार सिंह, शशि भूषण दुबे, अंजनी कुमार, मनोज कुमार, डॉ. अमर कुमार सिंह, डॉ. उदित नारायण, डॉ. प्रियंका झा और मेरी ऐन प्रिया ने अपनी बातें रखीं और शोधपत्र प्रस्तुत किए।
डॉ. अमर कुमार सिंह के अस्वस्थ होने के कारण उनके शोधपत्र को कृष्ण कुमार सिंह ने पढ़ा। सत्र के बाद ओपन क्वेश्चन एंड आंसर का आयोजन किया गया।
दूसरा सत्र: उच्च एवं तकनीकी शिक्षा और छात्र-युवा असंतोष
दूसरे सत्र का विषय उच्च एवं तकनीकी शिक्षा सह छात्र-युवा असंतोष था। इसकी अध्यक्षता प्रोफेसर रागिनी भूषण ने की।
इस सत्र में डॉ. ज्योति प्रकाश, पामेला घोष दत्ता, डॉ. मनोज कुमार और हेमंत पाठक ने हिस्सा लिया। सत्र का संचालन डॉ. पुष्पा कुमारी ने किया।
तीसरा सत्र रहा समापन सत्र
तीसरे और अंतिम सत्र की अध्यक्षता विधायक सरयू राय ने की। रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष शंभूनाथ चौधरी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। सत्र का संचालन चंद्रदीप पांडेय ने किया।
डॉ. जूही समर्पिता ने सभी तकनीकी सत्रों में वक्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों का संक्षिप्त सार प्रस्तुत किया। उन्होंने पूरे आयोजन को ऐतिहासिक और विशिष्ट बताया।
शिक्षकों की नौकरी को लेकर नियमावली बनाने की मांग
समापन सत्र में सरयू राय ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में अभी तक ऐसी नियमावली नहीं बन सकी है, जिसकी जरूरत शिक्षकों को लंबे समय से महसूस हो रही है।
उन्होंने कहा कि नियमावली नहीं होने के कारण आवश्यकता आधारित शिक्षकों के सिर पर नौकरी जाने का भय बना रहता है। उन्होंने सरकार से इस दिशा में जल्द नियमावली बनाने की मांग की।
सिर्फ डिग्री नहीं, रोजगार योग्य शिक्षा जरूरी: शंभूनाथ चौधरी
रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष शंभूनाथ चौधरी ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती रोजगार से जोड़कर देखी।
उन्होंने कहा कि आज शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा लक्ष्य नौकरी हासिल करना बन गया है, जबकि सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों में पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं।
एक सर्वे का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मात्र 8.1 प्रतिशत ग्रेजुएट ही अपनी योग्यता और अपेक्षा के अनुरूप नौकरी हासिल कर पाए हैं।
उन्होंने कहा कि आज समाज ऐसे ग्रेजुएट चाहता है, जो वास्तविक वर्किंग फोर्स बन सकें। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में बड़ी संख्या में ऐसे स्नातक तैयार हो रहे हैं, जिनके पास सामान्य डिग्री तो है, लेकिन आवश्यक कौशल नहीं है।
उन्होंने कहा कि ऐसे युवाओं को रोजगार योग्य बनाना बड़ी चुनौती है। शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ परीक्षा व्यवस्था भी इसके लिए जिम्मेदार है।
हादसे में युवती की जान बचाने वाले जामू शेख का भी हुआ सम्मान
शिक्षक सम्मान समारोह शुरू होने से पहले विधायक सरयू राय ने जीतिया पर्व के दिन स्वर्णरेखा नदी में डूब रही दो युवतियों में से एक की जान बचाने वाले जामू शेख को सम्मानित किया।
सरयू राय ने बताया कि जामू शेख हवा वाली मिठाई बेचते हैं। हादसे के समय उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना स्वर्णरेखा नदी में छलांग लगा दी और एक युवती को बचाने में सफल रहे।
सरयू राय ने कहा कि शिक्षकों का सम्मान तो होना ही चाहिए, लेकिन समाज में ऐसे जांबाज लोगों के साहस को भी सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने जामू शेख को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
इस अवसर पर शुभम नामक एक अन्य व्यक्ति को भी सम्मानित किया गया। हादसे के बाद शुभम लगातार लोगों को फोन कर मदद की गुहार लगा रहे थे। दोनों के सम्मान के दौरान सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
सुबह से कार्यक्रम में डटे रहे शिक्षक, अंत में हुआ सामूहिक सम्मान
‘शिक्षकों का सम्मान, शिक्षा का उत्थान’ कार्यक्रम की खास बात यह रही कि सुबह करीब 10 बजे पहुंचे शिक्षक कार्यक्रम की समाप्ति तक पूरे उत्साह और गंभीरता के साथ मौजूद रहे।
शिक्षकों ने सभी सत्रों में सक्रिय भागीदारी की और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। कार्यक्रम के अंतिम चरण में विधायक सरयू राय ने उपस्थित सैकड़ों शिक्षकों का सम्मान किया।
आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम का उद्देश्य केवल शिक्षकों को सम्मानित करना नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जमीनी समस्याओं को सामने लाना और उनके समाधान के लिए संवाद का वातावरण तैयार करना भी था।
आयोजन में इन लोगों की रही महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यक्रम को सफल बनाने में पवन सिंह, नवनीत सिंह, अमृता मिश्रा, राघवेंद्र सिंह, सुनीता सिंह, प्रेम सक्सेना, प्रवीण सिंह, शिरीन अख्तर, विकास साहनी, सुधीर सिंह, नीरज सिंह, तारक मुखर्जी, मनोज सिंह, अशोक कुमार और आदित्य मुखर्जी समेत अन्य लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का स्वागत भाषण स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट के ट्रस्टी अशोक गोयल ने दिया। मंच संचालन डॉ. मुदिता चंद्र ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन नेचर फाउंडेशन के ट्रस्टी अंशुल शरण ने किया।
समूचे आयोजन से एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई कि झारखंड में शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए केवल नई नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं होगा। स्कूलों की आधारभूत सुविधाओं, शिक्षकों की उपलब्धता, उनके सम्मान और वेतन, गुरु-शिष्य संवाद, तकनीकी शिक्षा तथा रोजगारपरक कौशल—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।



