
जोहार झारखंड श्रमिक महासंघ ने डीएलसी को ज्ञापन सौंप जमशेदपुर में ठेका प्रथा खत्म कर ठेका मजदूरों को स्थाई दर्जा देने की माँग की

जमशेदपुर : जोहार झारखंड श्रमिक महासंघ के महामंत्री राजीव पांडे के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने उप श्रमायुक्त, कोल्हान प्रमंडल, जमशेदपुर को एक विस्तृत मांग पत्र सौंपा।
इस पत्र में औद्योगिक इकाइयों में ठेका प्रथा के दुरुपयोग और श्रमिक अधिकारों के उल्लंघन पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।
स्थाई कार्यों में ठेका मजदूरों से काम – कानून का उल्लंघन
मांग पत्र में कहा गया है कि जमशेदपुर औद्योगिक क्षेत्र की कई कंपनियों में स्थाई और उत्पादन से जुड़े कार्यों — जैसे मेंटेनेंस, सिविल, गार्डनिंग, ट्रांसपोर्ट, कैंटीन, सफाई और सुरक्षा कार्य — में बड़े पैमाने पर ठेका मजदूरों से स्थाई प्रकृति के कार्य कराए जा रहे हैं।
इन मजदूरों से 10 से 12 घंटे तक काम लिया जा रहा है, परंतु न उन्हें स्थाई दर्जा दिया जा रहा है, न ही EPF, ESI, ओवरटाइम, बोनस, मेडिकल सुविधा जैसी बुनियादी श्रमिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
सर्विस ब्रेक” से अधिकारों का हनन
महासंघ ने बताया कि अधिकांश ठेका मजदूर 10 से 15 वर्षों से लगातार कार्यरत हैं, फिर भी उन्हें “अस्थाई” श्रेणी में रखकर हर वर्ष “सर्विस ब्रेक” दिखाया जाता है।
इस प्रक्रिया से कंपनियाँ उन्हें छटनी मुआवजा और सेवा सुरक्षा के अधिकारों से वंचित रखती हैं।
श्रम कानूनों और अदालतों के आदेशों का उल्लंघन
महासंघ ने कहा कि यह स्थिति कॉन्ट्रैक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबॉलिशन) एक्ट, 1970, फैक्ट्री एक्ट, 1948 और इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 25(M)(N) का खुला उल्लंघन है।
इसके साथ ही, बिहार-झारखंड फैक्ट्री रूल्स 1950 के नियम 66 और 71B के अनुसार, फैक्ट्री कैंटीन का संचालन किसी संवेदक (कॉन्ट्रेक्टर) द्वारा नहीं किया जा सकता।
महासंघ ने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के LIC केस (1040, 1973) के निर्णय में भी इस प्रावधान की पुष्टि की गई थी।
1979 के ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौते की याद
मांग पत्र में कहा गया कि 07 अगस्त 1979 को तत्कालीन श्रमायुक्त स्व. माधव सिन्हा की अध्यक्षता में हुआ त्रिपक्षीय समझौता आज भी लागू है।
इस समझौते में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि “स्थाई और निरंतर कार्यों में ठेका मजदूरों की नियुक्ति नहीं की जाएगी, और जो मजदूर ऐसे कार्यों में लगे हैं, उन्हें स्थाई दर्जा दिया जाएगा।”
महासंघ ने आरोप लगाया कि वर्तमान में इस समझौते की भावना और प्रावधानों का खुला उल्लंघन हो रहा है।
कई कंपनियाँ ठेका लाइसेंस में कार्य का विवरण “हाउसकीपिंग” या “मिसलेनियस जॉब” बताकर असल में उत्पादन कार्य करवा रही हैं।
महासंघ की प्रमुख माँगें
- स्थाई एवं उत्पादन कार्यों में लगे सभी ठेका मजदूरों को स्थाई कर्मचारी घोषित किया जाए।
- सभी ठेका मजदूरों को EPF, ESI, ओवरटाइम भुगतान, वेतन पर्ची और अन्य वैधानिक सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।
- कंपनी के लाभांश पर आधारित उचित बोनस दिया जाए।
- 07 अगस्त 1979 के त्रिपक्षीय समझौते का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
- स्थाई प्रकृति के कार्यों में अवैध ठेका प्रथा को समाप्त किया जाए।



