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JamshedpurJamshedpur PoliticsJD(U)JharkhandRail

सरयू राय हर बार असामान्य ही करते हैं

admin
Last updated: May 29, 2026 5:06 pm
admin
Published: May 29, 2026
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50 दिनों में ट्रेनों की लेटलतीफी का समाधान करवाना कोई खेल नहीं!

रेल यात्री संघर्ष समिति अभी भी निश्चिंत नहीं, चौकसी जबरदस्त

48 घंटों के भीतर अबीर मिश्रा की नियुक्ति सरयू राय की धमक को ही रेखांकित करती है!


✍️ पत्रकार आनंद सिंह की नजर में रेल आंदोलन


जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार वजह बनी है टाटानगर से गुजरने वाली यात्री ट्रेनों की लगातार लेटलतीफी के खिलाफ उनका आक्रामक आंदोलन और रेलवे प्रशासन को झुकाने की उनकी रणनीति।
27 मई को दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक अनिल कुमार जैन के साथ हुई महत्वपूर्ण बैठक में सरयू राय ने ट्रेनों की देरी का मुद्दा बेहद मजबूती और तीखे अंदाज में उठाया। उन्होंने साफ कहा कि मालगाड़ियों को प्राथमिकता देकर यात्री ट्रेनों को घंटों रोके रखना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बैठक में जीएम अनिल कुमार जैन ने तत्काल निर्देश जारी करते हुए कहा कि अब किसी भी परिस्थिति में मालगाड़ी को यात्री ट्रेनों से पहले नहीं छोड़ा जाएगा। पहले जहां चार-पांच मालगाड़ियां लगातार निकाल दी जाती थीं और यात्री ट्रेनें किसी लूप लाइन में खड़ी रहती थीं, उस व्यवस्था को बदलने का आदेश मौके पर ही दे दिया गया।
रेल यात्री संघर्ष समिति की सतर्कता ने बढ़ाया दबाव
बैठक के दौरान रेल यात्री संघर्ष समिति के संयोजक शिव शंकर सिंह ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया—“यात्रियों को कैसे पता चलेगा कि रेलवे अपने आदेश का पालन कर रहा है?”
इस सवाल पर जीएम ने एक और अहम निर्णय लिया। उन्होंने निर्देश दिया कि एक ऐसे अधिकारी की नियुक्ति की जाए जो प्रतिदिन ट्रेनों की लेटलतीफी की निगरानी करे और यह भी सुनिश्चित करे कि मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों पर प्राथमिकता न दी जाए। यही अधिकारी प्रतिदिन रेल यात्री संघर्ष समिति और मीडिया को स्थिति की जानकारी भी देगा।
इसी निर्णय के तहत महज 48 घंटे के भीतर दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल के कमर्शियल इंस्पेक्टर अबीर मिश्रा को टाटानगर में पूर्णकालिक पीआरआई (पब्लिक रिलेशन इंस्पेक्टर) नियुक्त कर दिया गया। इसे आंदोलन की बड़ी जीत माना जा रहा है।
7 अप्रैल से शुरू हुआ आंदोलन, जिसने रेलवे को झुकने पर मजबूर किया
इस पूरे आंदोलन की शुरुआत 7 अप्रैल 2026 को हुई थी, जब टाटानगर रेलवे स्टेशन परिसर में ट्रेनों की लेटलतीफी के खिलाफ पहली बार धरना आयोजित किया गया।
उस दिन आजसू जिलाध्यक्ष कन्हैया सिंह ने मंच से कहा था—“रेलवे को शायद अंदाजा नहीं है कि आज धरने पर बैठा कौन है। इतिहास गवाह है कि सरयू राय जब किसी मुद्दे को पकड़ लेते हैं तो समाधान होने तक पीछे नहीं हटते।”
बाद में यही बात आफताब अहमद सिद्दीकी ने भी दोहराई थी। उस समय शायद रेलवे प्रशासन को अंदाजा नहीं था कि यह आंदोलन इतना व्यापक रूप ले लेगा कि खुद रेल महाप्रबंधक को बातचीत की पहल करनी पड़ेगी।


चरणबद्ध तरीके से आंदोलन को धार देते गए सरयू राय
7 अप्रैल के धरने के दौरान ही सरयू राय ने संकेत दे दिया था कि यह आंदोलन लंबा और निर्णायक होगा। उसी दिन मिलानी हॉल में “रेल यात्री संघर्ष समिति” के गठन की घोषणा हुई और शिव शंकर सिंह को संयोजक बनाया गया।
इसके बाद आंदोलन लगातार विस्तार लेता गया। समिति ने साकची, बर्मामाइंस और मानगो में हस्ताक्षर अभियान चलाया। फिर 24 मई को आंदोलन चक्रधरपुर रेल मंडल की सीमा पार कर घाटशिला तक पहुंच गया, जो खड़गपुर रेल मंडल के अंतर्गत आता है।
घाटशिला में जिस तरह लोगों का समर्थन मिला, उससे आंदोलन और तेज हो गया। यात्रियों की पीड़ा खुलकर सामने आने लगी और रेलवे प्रशासन पर दबाव लगातार बढ़ता गया।
“रेल पटरी पर बैठने का विकल्प खुला है”
आंदोलन के दौरान रेल यात्री संघर्ष समिति ने हर सभा में यह स्पष्ट किया कि यदि मांगें नहीं मानी गईं तो रेल पटरी पर उतरने का विकल्प भी खुला है।
बतौर पत्रकार, इस आंदोलन को करीब से देखने पर यह साफ महसूस हुआ कि जनसमर्थन पूरी तरह सरयू राय के पक्ष में खड़ा था। आम यात्रियों में भारी नाराजगी थी और रेलवे प्रशासन के प्रति गुस्सा बढ़ता जा रहा था।
संभवतः यही वजह रही कि रेलवे के महाप्रबंधक अनिल कुमार जैन ने 7 अप्रैल से 26 मई के बीच मिले फीडबैक को गंभीरता से लिया और समाधान की दिशा में तेजी दिखाई।
76 साल की उम्र में चिलचिलाती धूप में तीन घंटे का धरना
इस आंदोलन का सबसे भावनात्मक दृश्य 7 अप्रैल को देखने को मिला। रेलवे प्रशासन ने पहले से तय धरनास्थल पर आंदोलनकारियों को जाने नहीं दिया। आरपीएफ के जवानों की तैनाती कर बैरिकेडिंग कर दी गई थी।
इसके बाद आंदोलनकारियों ने रेलवे स्टेशन के पार्किंग क्षेत्र के पास धरना शुरू किया। भीषण गर्मी के बीच 76 वर्षीय सरयू राय करीब तीन घंटे तक लगातार धरने पर बैठे रहे। न उठे, न हिले। पसीने से तर-बतर होते रहे, लेकिन अपनी जगह नहीं छोड़ी।
उस दिन आरपीएफ के एक सब-इंस्पेक्टर ने भावुक होकर कहा था—
“विधायक जी अपने लिए नहीं, हम सबके लिए लड़ रहे हैं। हम भी ट्रेनों की लेटलतीफी से परेशान हैं, लेकिन नौकरी में होने के कारण बोल नहीं सकते।”
50 दिनों में परिणाम, अब निगरानी की बारी
7 अप्रैल से 27 मई तक यानी महज 50 दिनों के भीतर रेलवे प्रशासन को यात्री ट्रेनों को प्राथमिकता देने का आदेश जारी करना पड़ा। इसके साथ ही 48 घंटे के भीतर अबीर मिश्रा की नियुक्ति ने यह संकेत भी दे दिया कि रेलवे अब इस आंदोलन को हल्के में लेने की स्थिति में नहीं है।
हालांकि, सरयू राय और रेल यात्री संघर्ष समिति अभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। समिति ने साफ किया है कि फिलहाल यह “परीक्षण काल” है। आने वाले दिनों में यह देखा जाएगा कि रेलवे अपने आदेशों का पालन कितनी गंभीरता से करता है।
यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो आंदोलन का अगला चरण और बड़ा हो सकता है। दिल्ली कूच तक की चेतावनी दी जा चुकी है।
यही वजह है कि लोग कहते हैं —

“सरयू राय हर बार असामान्य ही करते हैं”

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